
बहुत समय बाद कोई अच्छी फिल्म देखी और फिल्म ख़त्म होने के बाद भी मन उससे बाहर नहीं निकल पाया।
कुछ फिल्में हम देखते हैं, कुछ फिल्में हमें छूती हैं और कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो चुपचाप हमारे भीतर कहीं बैठ जाती हैं। Peranbu मेरे लिए ऐसी ही एक फिल्म है।
2019 में आई यह तमिल फिल्म शायद सिर्फ़ एक पिता और उसकी specially-abled बेटी की कहानी नहीं है। यह उससे कहीं ज़्यादा है। यह मनुष्य को उसकी सबसे कमजोर, सबसे असहाय और सबसे संवेदनशील अवस्था में देखने की कोशिश है। और शायद इसलिए यह फिल्म हमें बार-बार यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम किसी इंसान को उसकी परिस्थिति से देखते हैं या उसके भीतर मौजूद इंसान से?
फिल्म की कहानी एक पिता, अमुधन और उसकी बेटी पप्पा के इर्द-गिर्द घूमती है। पप्पा cerebral palsy से जूझ रही है और उसकी माँ उन्हें छोड़कर चली गई है। अमुधन के लिए बेटी की देखभाल सिर्फ़ एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उसकी पूरी ज़िंदगी बन जाती है।
एक पिता को हमने अक्सर परिवार का पालन-पोषण करते हुए देखा है, लेकिन एक ऐसे पिता को देखना जो अपनी बेटी के शरीर, उसकी जरूरतों, उसकी भावनाओं और उसकी बढ़ती उम्र के साथ आने वाली मुश्किलों को अकेले समझने की कोशिश कर रहा है—यह फिल्म को बहुत अलग बना देता है।
और यहाँ से फिल्म सिर्फ़ पिता-बेटी की कहानी नहीं रहती।
यह देखभाल की कहानी बन जाती है।
यह अकेलेपन की कहानी बन जाती है।
यह स्त्री की इच्छाओं और शरीर की कहानी बन जाती है।
यह समाज द्वारा बनाए गए नैतिक दायरों की कहानी बन जाती है।
और सबसे बढ़कर, यह compassion यानी करुणा की कहानी बन जाती है। फ़िल्म का नाम Peranbu का अर्थ भी ‘करुणा’ है ।
मुझे इस फिल्म की सबसे खूबसूरत चीज़ों में से एक उसका प्रकृति के साथ रिश्ता लगा। फिल्म में प्रकृति सिर्फ़ बैकग्राउंड नहीं है। जंगल, बारिश, समुद्र, रास्ते, मिट्टी—सब जैसे कहानी के अपने पात्र हैं। जैसे प्रकृति अमुधन से लगातार कुछ कह रही हो।
कभी वह उसे डराती है, कभी अकेला करती है, कभी रास्ता दिखाती है और कभी यह समझाती है कि जीवन हमेशा हमारी बनाई हुई योजनाओं के हिसाब से नहीं चलता।
शायद प्रकृति का सबसे बड़ा सबक यही है—स्वीकार करना।
पेड़ यह नहीं पूछता कि सामने वाला कितना सुंदर है। नदी यह तय नहीं करती कि किसे पानी देना है। बारिश यह नहीं देखती कि कौन उसके लायक है। प्रकृति बस अपने होने में सहज है।
लेकिन इंसान?
हमने हर चीज़ के लिए नियम बना लिए हैं—कौन अच्छा है, कौन बुरा है, कौन सामान्य है, कौन असामान्य है, कौन सम्मान के योग्य है और कौन नहीं।
Peranbu इन सभी सीमाओं पर सवाल करती है।
फिल्म में आने वाला हर पात्र जैसे अमुधन को जीवन का एक नया पाठ पढ़ाता है। कोई उसे सहारा देता है, कोई उसका फायदा उठाता है, कोई उसे धोखा देता है और कोई उसके भीतर की इंसानियत को पहचानता है।
अमुधन को अपने जीवन में धोखा मिलता है। लेकिन फिल्म किसी को भी बुरा बनाकर छोड़ नहीं देती। वह उसके पीछे के एक जीवन को , उनकी समस्याओं को और मजबूरियों को सामने रखती है।
यही शायद इस फिल्म की खूबसूरती है।
यह किसी को पूरी तरह अच्छा या पूरी तरह बुरा बनाने की कोशिश नहीं करती।
हर इंसान के पीछे एक कहानी है।
और शायद करुणा की शुरुआत वहीं से होती है, जब हम किसी के व्यवहार के पीछे छिपी उस कहानी को देखने की कोशिश करते हैं।
फिल्म देखते हुए कई बार लगा कि कहानी आगे नहीं बढ़ रही, बल्कि धीरे-धीरे हमारे भीतर उतर रही है। और शायद इसी वजह से इसका अंत भी किसी बड़े cinematic climax जैसा नहीं लगता।
बल्कि ऐसा लगता है जैसे जीवन ने हमें एक और अध्याय पढ़ाकर चुपचाप छोड़ दिया हो।
Peranbu मेरे लिए उन फिल्मों में से एक है जिसने मुझे प्रेम से ज्यादा करुणा के बारे में सोचने पर मजबूर किया।
रिश्तों से ज्यादा स्वीकार करने के बारे में।
और इंसान से ज्यादा इंसानियत के बारे में।
शायद प्रकृति भी हमें यही सिखाती है—
कि जीवन अपने आप में अधूरा नहीं होता।
हम ही उसके लिए पूर्णता की अपनी परिभाषाएँ बना लेते हैं।
और जब हम उन परिभाषाओं से बाहर निकलकर किसी दूसरे इंसान को देखना सीखते हैं, तभी शायद हम सच में इंसान होना सीखते हैं।










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